निर्माता-निर्देशकः संजय गुप्ता
सितारेः ऐश्वर्या राय बच्चन, इरफान खान, शबाना आजमी, चंदन रॉय सान्याल
रेटिंग **
जज्बा दक्षिण कोरियाई फिल्म सेवेन डेज की रीमेक है। यह एडवोकेट अनुराधा वर्मा (ऐश्वर्या राय बच्चन) की कहानी है जो बेहद कामयाब है। वह बड़े अपराधियों को बचाने के मुकदमे लड़ती है क्योंकि बेकसूर उसकी फीस नहीं चुका सकते। यह एडवोकेट सिंगल मदर भी है और एक दिन उसकी बच्ची का अपहरण हो जाता है।
फोन आता है कि अपहरण करने वाले को अनुराधा के पैसों में दिलचस्पी नहीं है, वह सिर्फ यह चाहता है कि कभी कोई मुकदमा न हारने वाली यह वकील रेप के मामले में फांसी की सजा पाए अपराधी मियाज शेख (चंदन रॉय सान्याल) को रिहा कराए। ऐसा नहीं हुआ तो वह अपनी बच्ची को जिंदा नहीं देख सकेगी। शेख को छुड़ाने के लिए केवल सात दिन हैं।
अपने केंद्रीय आइडिये में फिल्म भले ही रोचक लगे लेकिन निर्देशक संजय गुप्ता कहानी से ज्यादा ध्यान दृश्य रचने पर देते हैं। वह असमंजस में दिखते हैं कि उन्हें मसाला फिल्म बनानी है या दर्शकों के दिल पर छाप छोड़ने वाले रीयलिस्टिक फिल्म।
अपनी तरफ से वह फिल्म को बेहतर बनाने की बहुत गुंजाइश छोड़ते हैं। निश्चित रूप से जज्बा संजय के एक्शन-थ्रिलर ब्रांड से काफी पीछे है। एक और बात यह कि उनकी फिल्मों में संगीत हमेशा मजबूत पक्ष रहा है, जो यहां बहुत कमजोर है। ऐसा लगता है कि फिल्म बनाते हुए उन्हें संजय दत्त की कमी बहुत खली।
जज्बा की कहानी में हर बात आपको थोड़ा है थोड़े की जरूरत है जैसी मालूम पड़ती है। चाहे रोमांच हो या रोमांस। घूसखोर पुलिसवाला योहान (इरफान खान) अनुराधा के बचपन का दोस्त है और मन ही मन उससे प्यार करता है, मगर अपने जज्बात सदा काबू में रखता है। योहान बच्ची को ढूंढ़ने में अनुराधा की मदद करता है।
फिल्म में शबाना आजमी रेप और हत्यारे का शिकार हुई युवती की मां की प्रभावी भूमिका में हैं। उनका सामना करते हुए ऐश्वर्या और इरफान फीके पड़ जाते हैं। वैसे इरफान ने बढ़िया काम किया है और उनके हिस्से कुछ चुटीले संवाद भी आए हैं।
फिल्म अंतिम हिस्से में जरूर बांधती है लेकिन इससे पहले काफी ढीली है। कहानी दृश्यों के दोहराव का शिकार है। स्क्रिप्ट में नयापन नजर नहीं आता। इस सवाल का जवाब अंत तक फिल्म में नहीं मिलता कि कौन एडवोकेट अनुराधा वर्मा पर हमेशा नजर रखे रहता है और किस तरह?
ऐश्वर्या को कमबैक फिल्म में खुद को फिर से स्थापित करने का बहुत मौका मिला और उन्होंने इसका फायदा भी उठाया। अगर आपके मन में पांच साल बाद बड़े पर्दे पर लौटीं ऐश्वर्या को देखने की जिज्ञासा है तो जज्बा आपके लिए है।
इरफान के प्रशंसक भी इसे देख सकते हैं। ऐश्वर्या, इरफान और शबाना के बीच संजय गुप्ता फिल्म की कमजोर कड़ी साबित हुए हैं और इसी कारण उनके प्रशंसक संतुष्ट नहीं हो पाएंगे। ऐसे में अपने जज्बात और जेब का संतुलन देख कर ही फैसला करना बेहतर होगा।
सितारेः ऐश्वर्या राय बच्चन, इरफान खान, शबाना आजमी, चंदन रॉय सान्याल
रेटिंग **
जज्बा दक्षिण कोरियाई फिल्म सेवेन डेज की रीमेक है। यह एडवोकेट अनुराधा वर्मा (ऐश्वर्या राय बच्चन) की कहानी है जो बेहद कामयाब है। वह बड़े अपराधियों को बचाने के मुकदमे लड़ती है क्योंकि बेकसूर उसकी फीस नहीं चुका सकते। यह एडवोकेट सिंगल मदर भी है और एक दिन उसकी बच्ची का अपहरण हो जाता है।
फोन आता है कि अपहरण करने वाले को अनुराधा के पैसों में दिलचस्पी नहीं है, वह सिर्फ यह चाहता है कि कभी कोई मुकदमा न हारने वाली यह वकील रेप के मामले में फांसी की सजा पाए अपराधी मियाज शेख (चंदन रॉय सान्याल) को रिहा कराए। ऐसा नहीं हुआ तो वह अपनी बच्ची को जिंदा नहीं देख सकेगी। शेख को छुड़ाने के लिए केवल सात दिन हैं।
अपने केंद्रीय आइडिये में फिल्म भले ही रोचक लगे लेकिन निर्देशक संजय गुप्ता कहानी से ज्यादा ध्यान दृश्य रचने पर देते हैं। वह असमंजस में दिखते हैं कि उन्हें मसाला फिल्म बनानी है या दर्शकों के दिल पर छाप छोड़ने वाले रीयलिस्टिक फिल्म।
अपनी तरफ से वह फिल्म को बेहतर बनाने की बहुत गुंजाइश छोड़ते हैं। निश्चित रूप से जज्बा संजय के एक्शन-थ्रिलर ब्रांड से काफी पीछे है। एक और बात यह कि उनकी फिल्मों में संगीत हमेशा मजबूत पक्ष रहा है, जो यहां बहुत कमजोर है। ऐसा लगता है कि फिल्म बनाते हुए उन्हें संजय दत्त की कमी बहुत खली।
जज्बा की कहानी में हर बात आपको थोड़ा है थोड़े की जरूरत है जैसी मालूम पड़ती है। चाहे रोमांच हो या रोमांस। घूसखोर पुलिसवाला योहान (इरफान खान) अनुराधा के बचपन का दोस्त है और मन ही मन उससे प्यार करता है, मगर अपने जज्बात सदा काबू में रखता है। योहान बच्ची को ढूंढ़ने में अनुराधा की मदद करता है।
फिल्म में शबाना आजमी रेप और हत्यारे का शिकार हुई युवती की मां की प्रभावी भूमिका में हैं। उनका सामना करते हुए ऐश्वर्या और इरफान फीके पड़ जाते हैं। वैसे इरफान ने बढ़िया काम किया है और उनके हिस्से कुछ चुटीले संवाद भी आए हैं।
फिल्म अंतिम हिस्से में जरूर बांधती है लेकिन इससे पहले काफी ढीली है। कहानी दृश्यों के दोहराव का शिकार है। स्क्रिप्ट में नयापन नजर नहीं आता। इस सवाल का जवाब अंत तक फिल्म में नहीं मिलता कि कौन एडवोकेट अनुराधा वर्मा पर हमेशा नजर रखे रहता है और किस तरह?
ऐश्वर्या को कमबैक फिल्म में खुद को फिर से स्थापित करने का बहुत मौका मिला और उन्होंने इसका फायदा भी उठाया। अगर आपके मन में पांच साल बाद बड़े पर्दे पर लौटीं ऐश्वर्या को देखने की जिज्ञासा है तो जज्बा आपके लिए है।
इरफान के प्रशंसक भी इसे देख सकते हैं। ऐश्वर्या, इरफान और शबाना के बीच संजय गुप्ता फिल्म की कमजोर कड़ी साबित हुए हैं और इसी कारण उनके प्रशंसक संतुष्ट नहीं हो पाएंगे। ऐसे में अपने जज्बात और जेब का संतुलन देख कर ही फैसला करना बेहतर होगा।

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