
एक कलाकार के रूप में शाहरुख की राह धीरे-धीरे किन ऊँचाइयों की ओर गई, कहना
मुश्किल है। एक सितारे की हैसियत को देखते हुए उनका रास्ता बेहद चमकदार
नजर आता है। बॉलीवुड में कदम रखने पर शाहरुख को 'दीवाना' और 'दिल आशना है'
जैसी साधारण फिल्मों से आगाज करना पड़ा था। इन दोनों फिल्मों में उनकी
हीरोइन रही दिव्या भारती की रहस्यमय मौत पर केंद्रित मर्डर-मिस्ट्री
'बाजीगर' ने उन्हें स्टार बनाया।
अब्बास-मस्तान की इस फिल्म से शाहरुख स्टार बने तो यश चोपड़ा की 'डर' ने
उनको सुपर स्टार की पदवी दे दी। 'बाजीगर' में शाहरुख ने एक ऐसे नौजवान की
भूमिका निभाई थी, जो अपनी महिला मित्र को छत से धकेलकर मार डालता है। इस
फिल्म ने बॉलीवुड में निगेटिव भूमिकाओं के एक नए सिलसिले की शुरुआत की। यश
चोपड़ा जैसे रोमांटिक फिल्मकार भी इस लहर से ऐसे प्रभावित हुए कि उन्होंने
हॉलीवुड की सस्पेंस फिल्म 'केपफियर' पर आधारित 'डर' का निर्माण किया।
शुरुआत में इस फिल्म के हीरो थे सन्नी देओल। शाहरुख का किरदार उनकी
प्रेमिका (किरण/जूही) को परेशान करने वाले सिरफिरे नौजवान का था, मगर फिल्म
जब रिलीज हुई तो सारी तारीफ शाहरुख बटोर ले गए। यहाँ तक कि हीरो के हाथों
इस निगेटिव किरदार को पिटते देख दर्शकों की सहानुभूति शाहरुख के साथ थी।
'डर' फिल्म को लेकर शाहरुख, सनी देओल और यश चोपड़ा के बीच गहरे मतभेद हो
गए। बहरहाल फिल्म का सर्वाधिक फायदा शाहरुख को पहुँचा और वे यश चोपड़ा
कैम्प के स्थायी सदस्य हो गए। चोपड़ा बैनर की फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले
जाएँगे' ने शाहरुख की महानायक हैसियत और पुख्ता की। इस बीच अंजाम/फिर भी
दिल है हिन्दुस्तानी/डुप्लीकेट' जैसी फ्लॉप फिल्में भी प्रदर्शित होती
रहीं। शाहरुख के रफ्तार पकड़ते करियर को इनसे कोई नुकसान नहीं पहुँचा।
'दिल तो पागल है/कुछ कुछ होता है/ कभी खुशी कभी गम' जैसी फिल्मों ने शाहरुख
की रोमांटिक छबि बनाई। उनकी फिल्म 'देवदास' कान फिल्मोत्सव में प्रदर्शित
की गई। इसे आधिकारिक प्रविष्टि के बतौर ऑस्कर के लिए भेजा गया। फिल्म इस
काबिल नहीं समझी गई, मगर उन्मत्त प्रेमी की भूमिका में शाहरुख एक बार फिर
सराहे गए। दिलचस्प बात यह है कि इस रोल का प्रस्ताव मिलने तक शाहरुख ने
दिलीप कुमार अभिनीत 'देवदास' (1955) का पुराना संस्करण नहीं देखा था।
शाहरुख के अनुसार - 'करियर के आरंभ में मैंने परपीड़क की भूमिकाएँ निभाई
थीं, जो दूसरों की जान का दुश्मन है। 'देवदास' में मैं आत्मपीड़क बन गया।
देवदास ऐसा महान प्रेमी था, जिसने प्यार में खुद को मिटा डाला। शायद मैं
प्यार के लिए कभी जान नहीं दे सकता।'
निर्देशक संजय लीला भंसाली से जब किसी ने पूछा कि उन्होंने देवदास की
भूमिका के लिए शाहरुख को क्यों चुना, तो उनका जवाब था, 'मुझे उसकी आँखें हर
वक्त कुछ तलाशती नजर आती हैं। 'शाहरुख की शख्सियत में ये बेचैनी हमेशा
शामिल रही है। शायद यह सफलता पाने का जुनून ही था, जो उनकी खरगोश जैसी
आँखों से बरसता रहा।
शाहरुख ने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि वे घबराहट (नर्वसनेस) को
उत्तेजनापूर्ण अभिनय शैली के जरिये छुपाने की चेष्टा करते रहे हैं। तेज-तेज
संवाद बोलने की अनूठी शैली के चलते शाहरुख नई पीढ़ी के पसंदीदा सितारे बन
गए। उनकी अतिरिक्त ऊर्जा की तारीफ अमिताभ बच्चन जैसे सितारों ने भी की है।
शाहरुख इस महानायक को अपना पसंदीदा भारतीय एक्टर मानते हैं। उनका कहना है
कि अगर मुझे इंडस्ट्री में 25-30 साल और शिखर पर रहने का मौका मिले, तो भी
मैं अमितजी की बराबरी नहीं कर सकूँगा। छुटपन में शाहरुख अपनी मित्रमंडली को
कमरे में बंद कर बिग-बी के अंदाज में फिल्म 'दीवार' की याद करते हुए कहते -
'अब यहाँ से कोई एक ही जिंदा बाहर जाएगा।' प्रशंसा भाव के बावजूद अपने
अभिनय में अमितजी की नकल नहीं की। उनका विशिष्ट हड़बड़ाहट भरा तेवर उनकी
पहचान बन गया है।
हॉलीवुड सितारों में शाहरुख की पसंद हैं अभिनेता पीटर्स सेलर्स।
हिन्दुस्तानी कलाकारों में वे कमल हासन को काबिल अभिनेता मानते हैं। उनके
अनुसार मैं कभी अपने किरदार पर उतनी मेहनत नहीं कर सकता, जितनी कमल करते
हैं। कमल और शाहरुख ने विवादास्पद फिल्म 'हे राम' में साथ काम किया था।
एक राजनीतिक पत्रिका ने कुछ वर्ष पूर्व अपने सर्वेक्षण में शाहरुख को भारत
का सबसे सेक्सी हीरो घोषित किया था। इस सर्वेक्षण की और तह में जाने पर पता
चला कि प्रविष्टियाँ भेजने वाले ज्यादातर प्रतिभागी बच्चे थे, जिन्हें
सेक्सी शब्द का अर्थ नहीं पता होता। फिर भी इस सर्वेक्षण से बच्चों में
शाहरुख की लोकप्रियता जरूर उजागर हुई। फिल्म 'कहो ना प्यार है' प्रदर्शित
होने के बाद रितिक रोशन के हाथों शाहरुख का यह रुतबा छिन गया था। शाहरुख के
चेहरे में नजर आने वाली बालसुलभ मासूमियत उन्हें प्रौढ़ महिलाओं और बच्चों
के बीच लोकप्रिय बनाने में सहायक रही। 'बादशाह' और 'डुप्लीकेट' जैसी
फिल्में शाहरुख द्वारा पूरी तरह बाल दर्शकों को ध्यान में रखकर पेश की गई
थीं। शाहरुख कहते हैं कि फिल्म 'कुछ-कुछ होता है' में पहली बार पिता का रोल
करते हुए उन्हें काफी मुश्किल पेश आई।
निजी जीवन में एक अच्छे पिता की छबि के चलते शाहरुख को बाल दर्शकों के बीच
अपनी पैठ बनाने में मदद मिली। फिल्म 'जोश' में शाहरुख द्वारा गाया गीत
'अपुन बोला' सबसे ज्यादा बच्चों में लोकप्रिय हुआ था।
शक्ल-सूरत से शाहरुख किसी स्कूली-छात्र की तरह भोले-भाले नजर आते हैं, पर
उनके पास एक तेजतर्रार व्यसायी दिमाग है। वे पहले दर्जे के तिकड़मबाज इंसान
हैं। बेहद चतुराई के साथ उन्होंने अपनी पेशेवर गोटियाँ बिछाईं। प्रेस के
साथ अपने संबंधों को बुद्धिमत्तापूर्वक इस्तेमाल किया। इंडस्ट्री में शायद
ही कोई उन जैसा कुशल मीडिया प्रबंधक हो। प्रेस ने उन्हें सुपर स्टार की
हैसियत दी। सिने उद्योग में शाहरुख ने अपना गुणगान करने वाली एक प्रचार
मंडली तैयार कर रखी है।
यह तीन-तिगाड़े शाहरुख का काम बिगाड़ने के बजाय सँवारते हैं। युवा स्टार
रितिक रोशन का आगमन शाहरुख के लिए सबसे मुश्किल दौर था। इस काल में उनकी
प्रचार मंडली ने बॉलीवुड में यह सनसनी फैलाए रखी कि शाहरुख को फलाँ बड़े
बैनर ने अनुबंधित किया है या फलाँ फिल्म में उनके शानदार अभिनय का कोई जवाब
नहीं। फिल्म फेयर के तत्कालीन संपादक खालिद मोहम्मद पर शाहरुख की अतिरिक्त
तरफदारी पर काफी बवाल मचा था, जब एक के बाद एक सारे फिल्म फेयर अवार्ड
शाहरुख की झोली में डाल दिए गए। आमिर और सन्नी देओल जैसे अभिनेताओं ने इन
पुरस्कारों से इसीलिए दूरी बरतनी शुरू कर दी।
इस तथ्य को सिर्फ बॉलीवुड के व्यसाय विशेषज्ञ ही समझते हैं कि बॉलीवुड में
शाहरुख का सिक्का जिस तरह चमकता है, उससे कहीं ज्यादा धूम उनकी विदेश में
है। अप्रवासी भारतीयों के बीच उनको जबर्दस्त लोकप्रियता मिली। देखा जाए तो
अमिताभ बच्चन के बाद वे सही अर्थ में ओवरसीज मार्केट के शहंशाह हैं।
'परदेस/दिलवाले दुल्हनिया../कुछ-कुछ होता है/कभी खुशी कभी गम' जैसी फिल्मों
के बाद प्रवासी भारतीय बाजार का दरवाजा बॉलीवुड निर्माताओं को जन्नत की
दहलीज आया। 50 करोड़ की लागत से बनी 'कभी खुशी कभी गम' और 'देवदास' जैसी
शाहरुख की महँगी फिल्में ओवरसीज मार्केट से लागत निकाल पाईं। शाहरुख की इस
बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि सुपर स्टार बन जाने के बावजूद उन्होंने
अपनी जड़ों से रिश्ता नहीं तोड़ा। जहाँ नसीरुद्दीन शाह जैसे स्थापित कलाकार
दम तोड़ते कला सिनेमा पर आरोप लगाने से बाज नहीं आए, वहीं शाहरुख ने सईद
मिर्जा/केतन मेहता/अजीज मिर्जा/संतोष सिवन/ मणि कौल जैसे कला निर्देशकों की
फिल्मों में लगातार दिलचस्पी दर्शाई।
'इडिएट' और 'माया मेमसाब' जैसी उनके करियर की आरंभिक फिल्में कलात्मक
अभिव्यक्ति के लिए सराही गई थीं। भले ही शाहरुख, नसीर, ओमपुरी, रजत कपूर की
तरह कला फिल्मों के चिर-परिचित अभिनेता नहीं बन सके, फिर भी प्रयोगधर्मिता
के प्रति उनका रुझान जरूर सराहा जाएगा।
सुपरस्टार के रूप में लंबी पारी
निर्विवाद रूप से शाहरुख बीसवीं सदी के आखिरी महानायक कहे जा सकते हैं। 90
के दशक से उनका सिलसिला शुरू हुआ और अब तक जारी है। शाहरुख की फिल्मी और
सार्वजनिक छबि इस प्रकार रही कि उन्हें पूर्व राष्ट्रपति श्री
के.आर.नारायणन द्वारा सर्वश्रेष्ठ नागरिक का सम्मान दिया गया। अपने शुरुआती
बारह वर्षीय फिल्म करियर में शाहरुख ने ज्यादातर रोमांटिक भूमिकाएँ
निभाईं, फिर भी वे खुद को पर्दे पर लवर-बॉय नहीं मानते। उनके अनुसार मैंने
'अशोका', 'वन-टू का फोर' जैसी फिल्मों में आक्रामक किरदार निभाए। मगर मुझे
सिर्फ प्रेम कथाओं में पसंद किया जाता है। शाहरुख कहते हैं कि वे आलोचनाओं
से नहीं घबराते।
पर रितिक रोशन फैक्टर के प्रभाव में उनके पराभव की चर्चाओं ने उन्हें
विचलित कर दिया था। खुद को शाहरुख सर्वश्रेष्ठ नहीं पर मेहनती एक्टर मानते
हैं। उनका कहना है - 'अगर मैं बुरा अभिनेता होता, तो इतने फिल्म फेयर
अवार्ड मुझे नहीं मिलते।' तकनीकी रूप से शाहरुख की नजर में अमिताभ
बच्चन/आमिर खान/परेश रावल/ नसीरुद्दीन शाह/कमल हासन श्रेष्ठतम कलाकार हैं।
गोविंदा और जॉनी लीवर की लाजवाब टाइमिंग भी उन्हें प्रभावशाली नजर आती है।
अपने करियर में शाहरुख ने इन कलाकारों से काफी कुछ सीखा है।